Call and Put Option in Hindi

डेरीवेटिव के बारे में और जानें

शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने के लिए कई माध्यम उपलब्ध है। उनमें से एक ऑप्शन ट्रेडिंग है। ऑप्शन ट्रेडिंग में कॉल और पुट ऑप्शन (Call and Put Option in Hindi) जैसे टर्म्स आते हैं जिनको समझना थोड़ा मुश्किल होता है।

हालाँकि यह देखा गया है कि ज्यादातर लोगों को डेरीवेटिव ट्रेडिंग (Derivative Trading) को समझने में कंफ्यूजन आती है।

आइये पहले इक्विटी ऑप्शन का अर्थ समझते हैं।

मान लीजिये आप एक थोक सब्जी विक्रेता हैं। आप सब्जियों के माल ढुलाई के लिए ट्रांसपोर्टेशन की मदद लेते हैं।

अगर मार्केट में डीजल या पेट्रोल की कीमत बढ़ेंगे तो आपको सब्जियों के माल ढुलाई के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ंगे।

परिणामस्वरूप, आप इस अतिरिक्त खर्चे को बैलेंस करने के लिए सब्जियों के दाम में इजाफ़ा करेंगे।

अब आप इस पूरे परिदृश्य को देखते हैं तो आपको पता लगा होगा कि अगर पेट्रोल या डीजल के भाव बढ़ेंगे तो सब्जियों के दाम भी बढ़ जाएंगे।

ठीक इसी तरह, इक्विटी ऑप्शन (equity Option) भी एक डेरीवेटिव इंस्ट्रूमेंट (Derivative Instrument) है, जिनकी कीमतें अन्य फाइनेंशियल प्रोडक्ट (Financial Product) के मूवमेंट पर निर्भर करती है।

चलिए इस पोस्ट में Call and Put Option in Hindi दोनों के बारे में विस्तार से बात करते हैं।


What is Call and Put Option in Hindi

पहले कॉल ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट (Call Option Contract) को समझते हैं।

कॉल ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट में एक खरीददार (Buyer) के पास अधिकार होता हैं, लेकिन वे उसके लिए बाध्य या उसका दायित्व नहीं होता कि, वे कॉन्ट्रैक्ट में निर्धारित की गयी अंडरलाइंग स्टॉक (Underlying Assets) की तय मात्रा को तय समय पर तय कीमत पर खरीदें।

लेकिन, ऑप्शन सेलर या राइटर को ये दायित्व होता है कि वे अंडरलाइंग एसेट्स को निर्धारित कीमत पर तय मात्रा में खरीदार को बेचे।

हालाँकि, खरीददार को इस अधिकार यानी राइट्स लेने के लिए एक प्रीमियम फीस चुकानी होती है।

यह प्रीमियम अमाउंट टोटल कॉन्ट्रैक्ट अमाउंट का एक हिस्सा होता है।

कॉल ऑप्शन खरीदने से पहले ट्रेडर यह देखता है कि भविष्य में स्टॉक या इंडेक्स के भाव में तेजी होने वाली है, तभी वह ट्रेडर कॉल ऑप्शन खरीदता है।

मान लीजिए कि एक शेयर की कीमत ₹100 रूपये है और आपको 3 महीने बाद यह शेयर ₹150 पर खरीदने का अधिकार मिलता है।

आपके पास अधिकार होता है कि आप कॉल ऑप्शन तभी खरीदें जब शेयर की मार्केट प्राइस 150 से ऊपर हो।

अब अगर 3 महीने बाद शेयर के भाव ₹150 रुपये से अधिक भी होता है तब भी आपको शेयर ₹150 रुपये पर ही खरीदने का मौका मिलेगा।

लेकिन आपको कॉल ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट करने के लिए ₹10 रुपये की फीस देनी पड़ेगी।

अब अगर 3 महीने बाद शेयर की कीमत ₹200 रुपये हो जाएगी तो आप अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शेयर को केवल ₹150 रुपये पर खरीद सकते है।

लेकिन अगर शेयर के प्राइस ₹150 से नीचे जाते तो भी आपके पास अधिकार होगा कि आप अपने नुकसान को सीमित करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट से बाहर आ जाएं।

हालाँकि, यहाँ पर आपको प्रीमियम अमाउंट का नुकसान उठाना पड़ेगा।

लेकिन, सेलर यानि विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होगा कि वह उस कॉन्ट्रैक्ट से बाहर हो।

वह इस उम्मीद में होता है कि शेयर के भाव या तो ₹150 ही रहें या उससे कम हो जाए जिससे उसको फायदा हो।

अब पुट ऑप्शन की बात करते हैं।

पुट ऑप्शन, कॉल ऑप्शन के बिलकुल विपरीत है।

Call and Put Option में बुनियादी अंतर यह है कि Call Option में खरीददार बाजार में तेजी की उम्मीद करता है तो Put Option में खरीददार मंदी का अनुमान लगाता है।

पुट ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट में खरीददार बेचने का अधिकार खरीदता है। उसे यह अधिकार मिलता है कि वह कभी भी अंडरलाइंग को स्ट्राइक प्राइस पर ऑप्शन सेलर को बेच सके।

इसका मतलब है कि पुट ऑप्शन में बेचने वाले खरीददार को बेचने का अधिकार बेच रहा है।

इस प्रकार, पुट ऑप्शन का खरीददार उम्मीद करता है कि बाजार में मंदी हो और पुट ऑप्शन का विक्रेता यह अनुमान लगाता है कि कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने तक बाजार में कीमत वही रहे या तेजी आये।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जो पार्टी प्रीमियम का भुगतान करती है वह Buyer होता है और प्रीमियम लेने वाला पक्ष Seller होता हैं।

आइये इस एक आसान उदाहरण के साथ समझते हैं।

मान लीजिये टाटा मोटर्स शेयर ₹200 पर ट्रेड कर रहा है। इसमें कॉल ऑप्शन का बायर यह अधिकार खरीदता है कि वह कॉन्ट्रैक्ट को एक्सपायरी के दिन टाटा मोटर्स के शेयर ₹200 रुपये पर बेच सकता है।

इसके लिए वह कॉन्ट्रैक्ट सेलर(Contract Seller) को एक प्रीमियम अमाउंट का भुगतान करता है।

प्रीमियम अमाउंट लेने के बाद कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता का यह दायित्व होता है कि वह कॉन्ट्रैक्ट ₹200 तक खरीदेगा।

मान लीजिए, एक्सपायरी डेट पर टाटा मोटर्स के शेयर ₹175 रुपये पर आ जाते है तो कॉन्ट्रैक्ट खरीदने वाला अपने राइट्स का इस्तेमाल करते हुए कॉन्ट्रैक्ट बेचने वाले टाटा शेयर्स को ₹200 रुपये पर बेच सकता है।

इस तरह से कॉन्ट्रैक्ट खरीदने वाला 25 रुपए प्रति शेयर का लाभ उठा सकता है।

अगर टाटा मोटर्स के शेयर का भाव ₹200 से बढ़कर ₹220 तक पहुँच जाते है तो फिर कॉन्ट्रैक्ट बचने वाले को फायदा होता है।

इस स्थिति में कॉन्ट्रैक्ट खरीदने वाले को अपने प्रीमियम अमाउंट का नुकसान उठाना पड़ेगा, जो कॉन्ट्रैक्ट बेचने वाले के पास होता है।


निष्कर्ष

अब तक आपको पता लग गया होगा कि Call and Put Option in Hindi में खरीदने और बेचने का दृष्टिकोण क्या होता है।

ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट से मुनाफा कमाने के लिए जरुरी है कि मार्केट प्राइस से स्ट्राइक प्राइस का फासला ज्यादा हो।

इसलिए ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट करने से पहले जरुरी है कि सही स्ट्राइक प्राइस का चुनाव हो।


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